सीटों पर खर्च 

पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टियों ने जो खर्च किया अब उसकी रिपोर्ट आई है। भाजपा को जीती हुई एक सीट चार करोड़ में और कांग्रेस को एक सीट 15 करोड़ में पडी।


आखिर इतना पैसा कहां से आता है और कौन से लोगों तक पहुंचाता है। यही बात है जो चुनावों को स्वच्छ नहीं होने देती जीते हारे सबको मिला ले तो भाजपा के हर प्रत्याशी पर लगभग 3 और कांग्रेस के हर एक प्रत्याशी पर दो करोड़ खर्च किया गया। अगर बात करें तो यह लोग इनकम टैक्स दायरे में भी नहीं आते हैं और यह लोग इनकम टैक्स का भुगतान भी नहीं करते । इस बारे में आरटीआई के जरिए आपसे कोई कुछ पूछ नहीं सकता आम आदमी का टैक्स आपको कम करना नहीं है, आम आदमी पर साधा जाता है और उस पैसे से चुनाव में वोटों को खरीदा जाता है। नहीं देगा तो सड़क कैसे बनेगी, बिजली, हॉस्पिटल, रेलवे स्टेशन इत्यादि आदि सुविधाएं उसे कहां से मिलेंगे फिर जीतकर सांसद आते हैं तो वह आम लोगों के बारे में ना सोच कर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने रहते हैं ।आखिर आपके आने से कोई तो फर्क पड़ना चाहिए। कुछ भी तो नहीं बदला सारी परिस्थितियां वैसी की वैसी हैं सूरज भी उसी तरह आंखें मलते निकलता है। जैसी जनता पहले थी वैसी जनता आज है जो परेशानियां उसे पहले थी वही परेशानियों से आज भी हैं। प्यास ना लगती है पानी की या नाखून वरना बंद हो जाता है बाल हवा में उड़ते और धुआं निकलता सांसो से कुछ भी नहीं बदला फिर ऐसा क्या है कि तमाम सहूलियत है नेताओं को पार्टियों को ही मिलती है और उन को पूरा करने के लिए आम आदमी सिर्फ अपनी मेहनत का पैसा टैक्स के रूप में भरता चला जाता है फिर तो लोग करोड़ों खर्च करके चुनाव जीते हैं उनसे ईमानदारी की आशा की जाती है कि वह चुनाव जीतने के बाद देश के लिए कुछ करेंगे, समाज के लिए कुछ करेंगे । दूसरी तरफ आम आदमी हर स्थिति में रहता है कि वह अपने आप को उस में डाल सके । अगर कोई पूछे कि इन पार्टियों का चुनावी खर्चों में अरबों रुपए कहां से आता है और उसका पूरा ब्यौरा हो। चुनाव आयोग यूं तो हर प्रत्याशी का पूरा  ब्यौरा लेता है लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं कोई ना कोई  छोटी चूक इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित  आती है।